क्या अगला महमूद गज़नवी आने से पहले हम अपनी निद्रा भंग कर पाएँगें ?

Blog Case Studies
Save

Business Mantra : Faridabad

लेखक:– श्री संजीव सरोलिया जी (Email ID :- surolia@gmail.com)

हिन्दी अनुवाद:– संम्पादक C.A संजय कुमार

भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता रहा है। इस सोने की चिड़िया नें हजारों लोगों को आकर्षित किया है। जिनमें छोटे व्यापारियों से लेकर बड़े पूंजीपति और उधोगपति ही नही अपितु आत्मिक और मानसिक शान्ति प्राप्ति के जिज्ञासु भी शामिल है। लेकिन इसके साथ-साथ इसने महमूद गजनवी जैसे आक्रमणकारियों और लुटेरों को भी आकर्षित किया। हमारे मन्दिरों में धन और सोने के भण्डार एकत्रित थे। राजाओं के खज़ाने में सोने के अम्बार लगे हुए थे। लेकिन क्या यह धन, सम्पत्ति, खज़ाने लुटेरों के आक्रमण से हमारे देश को बचा पाए?, इसका उत्तर है, नही। क्योंकि हमनें इस सम्पत्ति को मूलभूत ढांचा (infrastructure) बनानें में प्रयोग नही किया। हमनें अपने देश के लोगों में स्वयं को बाहरी आक्रमण से बचाने के लिए तैयार नही किया। हमने उस खज़ाने को नई तकनीक, नए तरीकों की युद्ध सामग्री जुटाने में प्रयोग न करके, उसका अनिवेश और केवल संग्रह किया। हमनें अपने देश के लोगों में एक जाति विभाजन किया, और केवल वह वर्ग ही देश के लिए लड़ सकता था। इस सब का अंजाम क्या हुआ ? यही कि बहुत ही आसानी से हमारे हज़ारों सैनिकों को महमूद गज़नवी के कुछ लुटेरों के सामने आत्म समर्पण करना पड़ा। देश की सारी सम्पत्ति को लूट लिया गया। हम केवल भगवान से यही विनती करते रहे कि सोमनाथ मन्दिर कि मूर्ति में से भगवान स्वयं प्रगट हों और हमारी और अपनी स्वयं रक्षा करें। और उस समय हम अध्यातम की उस शिक्षा को भूल गए कि भगवान कभी हमारे लिए काम नही करते, वे हमेशा हमारे साथ काम करते है।

यदि हम अपने देश के इतिहास पर एक नजऱ ड़ाले, तो हम पाएगें कि यह वीरों की शोर्य गाथाओं से भरा पडा है। जिन्होने अपनी मातृभूमि के लिए, बिना अपने मूलभूत सिद्धान्तों को छोड़े, अपने जीवन का बलिदान दे दिया, वे अपने विजयी आक्रांताओं से किसी भी प्रकार से कम नही थे, अन्तर केवल इतना था कि हम अपने पुराने और सदियों से चले आ रहे युद्ध सिद्धान्तों, तकनीकों और युद्ध सामग्रियों पर विश्वास कर रहे थे, जबकि खेल के नियम बदल चुके थे। हम अपनी निजी ताकत और युद्ध की परम्परागत साम्रगी और तरीकों पर पूर्णत: आश्रित थे और मुगल अपने साथ तोपें लाए थे, जिसने बडी आसानी से हमारे हज़ारों वीर सैनिकों, घोडों, हाथियों की भारी सेना को डरा दिया। उन घोडों और हाथियों नें तोपों की गर्जन भरी आवाज़ और भीषण आक्रमण का सामना कभी पहले नही किया था, जिससे वे उसका सामना नही कर सके, और हमें बिना युद्ध करे ही पराजय का मुख देखना पड़ा। यहाँ पर हमारी पराजय इसलिए हुई क्योंकि हम नई तकनीक से अवगत नही थे।
ठीक इसी प्रकार ब्रिटिश हमारे देश में राईफल्स के साथ आए जो कि तोपों की अपेक्षा अघिक उत्तम हथियार थे, फलस्वरूप हम फिर से पराजित हुए ओर भारत ब्रिटेन की एक कालोनी बन गया। सन् 1947, में स्वतन्त्रता के पश्चात हमने अपने विभिन्न संस्थानों को खडा किया है। अब आज़ादी के 68 वर्षों के उपरान्त हम एक विकसित प्रजातंत्रिक व्यवस्था को प्राप्त करनें में सफल तो रहे है, परन्तु अपनी जिन कमियों का खामियाज़ा हम 10वीं शताब्दी से भुगतते आ रहे है, वे कही न कही आज भी हमारी सोच     और नीतियों में झलक रहीं है।

UPA सरकार ने, मुफ्त उपहारों की नीतियों को लागू करके सबसे अधिक नुकसान पहुँचाया है, उनके द्धारा बनाए गए विधेयक, उदाहरणार्थ भूमि अधिग्रहण कानून, भोजन का अधिकार, मुफ्त दवाईयाँ इत्यादि ने देश को नुकसान पहुँचाया है। आर्थिक मोर्चो पर उन्होने, यह सुनिश्चित किया कि सोने की कीमते 2004 में, जब वे सत्ता में आए, 5850रु./ प्रति.ग्रा. से लेकर सन् 2014, (उनके सत्ता छोडने पर) 30000 रु./ प्रति.ग्रा. तक द्रुतगामी गति से बढ़ते रहे। भारत में, लोगों को धन कमाने के आसान साधन सिखाने की आवश्यकता नही रही।10 वर्षों में लगभग 500% का आय सृजन किसी भी व्यापार में लगभग अंसभव है। सोने के बाद सबसे अधिक आय जमीन में रही, इसलिए देश के पैसे का अधिकांश भाग इन दो अनुत्पादक सम्पत्तियों (सोना और जमीन एंव भवन) में फंस (Block) गया। भूमि व्यवसायियों ने अपने आप को उधोगपति दिखाकर सरकार से बडी-बडी जमीने आंवटित कराई। यह आंवटन, जमीन के बाज़ार मूल्य से बहुत कम (लगभग 10% तक नीचे) कीमतों पर किया गया। इसका परिणाम कुछ इस प्रकार आया कि वे भूमि व्यापारी जिन्हे पिछले 25 वर्षों से उधोगों का कोई अनुभव नही था, उनके नाम पर उधोगों के लिए जमीन आंवटित हुई, जिन्हे सरकार ने बाद में बढती जनंसख्या के दबाव के कारण उस खाली पडी औधोगिक जमीनों को आवासिय भूमि (Residential Land) घोषित कर दिया और उन व्यापारियों को फिर से पैसा कमाने का मौका मिल गया। उन्होने कुछ पैसे से देश के किसी दूसरे हिस्से में और पैसा कमाने के लिए और जमीन खरीद ली और यह प्रक्रिया उनके और उनके परिवार के लिए जैसे पैसा कमाने की एक बीमा पालिसी की तरह निर्मित हो गई। भू-माफिया और सरकार के बीच का यह गठजोड दोनो के लिए अत्यन्त फायदे का सौदा रहा। मुंबई का “अन्धेरी औधोगिक क्षेत्र” जो कि पूरी तरह आवासिय और व्यवसायिक क्षेत्र में परिवर्तित हो चुका है, इस बात का एक ज्वलन्त उदाहरण है। देश में कई ऐसे उदाहरण भरे पडे हैं जँहा केवल जमीन हथियाने के लिए SEZ बनाए गए। भ्रष्टाचारी नेताओं. भू-माफियाओं. अफसरों और उधोगपतियों की ऐश होती रही और दूसरी ओर गरीब किसान की दशा बद् से बद्तर होती रही।

देश ने श्री नरेन्द्र मोदी जी को बडी आशा एवं आकांक्षाओं के साथ, उनके “सबका साथ, सबका विकास” के नारे पर एवं “सुशासन” के वादे पर विश्वास रखते हुए सत्ता सौंपी है। परन्तु इस समय जनता कुछ अधीर हो रही है क्योंकि अभी तक सुशासन एवं सभी का विकास जैसी बातें धरातल पर नजर नही आई है। जैसा कि वादा किया गया था कि सभी पुराने, अतार्किक कानूनों को वापस लिया जाएगा, परन्तु कोई कानून वापस नही लिया गया है। काले धन को वापस लाने के वायदे पर भी सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार एक SIT बनाने के अलावा और कोई ठोस कदम उठाती नज़र नही आ रही है। वे लोग जिन्हे व्यापार में अल्प समय हुआ है एवं जिन्होने अपने खातों में ना दिखाए हुए (unaccounted) पैसे को अपने व्यापार में लाने के लिए कम्पनियों का सहारा लिया, उन व्यापारियों के लिए आयकर अधिकारियों को द्वारा खुली छूट दे दी गई है। मैं यह नही कहता कि उन्हे छूआ ना जाए, परन्तु यह जानना महत्वपूर्ण है कि सरकार की नज़रों में मुख्य समस्या क्या है। वह पैसा जो देश के बाहर जमा है या वह पैसा जो देश में ही व्यापार एवं रोज़गार के अवसर पैदा कर रहा है। इस समय बैकों की नीतियां भी कुछ इस प्रकार की हैं कि बड़े व्यापारी हजारों करोड़ के ऋण लेकर चूना लगा रहे है। जब ये ऋण खाते NPA हो जाते हैं तब उन्हे restructuring और BIFR packages के फायदे भी मिल जाते हैं परन्तु वह आम आदमी जो कि छोटा व्यापार कर रहा है उसके पास ऐसा कोई ठिकाना नही है।

रिजर्व बैंक ने सरकार को विश्वास दिला दिया है कि ब्याज दरें और कम नहीं की जानी चाहिए वरना मंहगाई बढ़ जाएगी। शेयर बाज़ार के माध्यम से पूंजी इकट्ठा करने की कोशिशों पर नियमन (regulation) के नाम पर SEBI ने नकेल कस रखी है। एक आम आदमी जो साफ नीयत से व्यापार करना एवं बढ़ाना चाहता है, उसे इस नियन्त्रण एवं नियमन प्रक्रिया (regulatory process) ने भयभीत कर दिया है, परिणामस्वरुप केवल बड़ी कम्पनियाँ एवं अत्यधिक व्यवस्थित लोग ही शेयर बाज़ार से पूँजी इकट्ठी कर पा रहे हैं एवं बाकी लोग केवल बैंक ऋण का ही आश्रय ले रहे है। कम पूँजी के कारण उनकी ऋण लेने की पात्रता भी कम रह जाती है। उनके व्यापार में तेज विकास के सपने फिर सपने ही रह जाते हैं।

सरकार को SEBI की उपलब्धियों का अंकेक्षण (Performance Audit) कराना चाहिए कि SEBI कि उपलब्धियाँ क्या रहीं एवं कितनी बाधाएँ SEBI की कार्यशैली से उत्पन्न हुई। बैकों के माध्यम से प्रयोग में लाए जाने वाले CIBIL की तरह SEBI को Entrepreneur Rating System बनाना चाहिए। SEBI को अभी तक धोखाधड़ी के पैसे वापस लाने में सफलता नही मिली है। Penny shares में हो या धोखाधड़ी के लिए बनाई कम्पनियों में हो, निवेशकों के नुकसान की भरपाई नहीं हो पाई है। गरीब एवं असहाय निवेशकों के हजारों करोड़ डकारने वाली श्रद्धा, पर्ल, रोज़ वैली जैसी चिट फंड कम्पनियोँ के मामलों में SEBI अफसरों की मिली भगत सामने आई है। हज़ारों दोषी Operator ऐसे है जिन्होंने निर्दोष निवेशकों के पैसे डकारे है एवं वे उसके बाद उस पैसे का मजा ले रहे है तथा उन पर किसी भी ओर से कोई भी कार्यवाही नही हो पाई है। SEBI की अक्षमताओं के कारण निवेशकों को नुकसान पहुचाँ है। दूसरी ओर SEBI ने नियमों का इतना बोझ बना दिया है कि अच्छी नीयत वाले व्यपारी को शेयर बाज़ार से पैसा जुटाने का अवसर नही मिल पा रहा है। वे अपनी पूजीँ की आवश्यकताओं के लिए USA या कहीं ओर के PE Funds के पास जाने के लिए बाध्य हैं। एक समय था जब रिलायंस, विपरो, एवं इनफोसिस जैसी कम्पनियोँ ने भारत के लोगों से पैसा इकट्ठा किया एवं भारत के लोगों को ही उसका फायदा (Return) मिला। लेकिन आज विदेशी पूजीँ निवेशकों (FII) को यह लाभ मिल रहा है। FII अपने फायदे के लिए शेयरों की कीमतों को 5 से 10 गुना तक बढ़ाते है और तत्पश्चात बहुत बड़ी मात्रा में लाभ कमा कर अपना पैसा बाहर निकाल लेते है। यह पैसा भारतीय भी कमा सकते है, परन्तु हो यह रहा है कि सबसे अधिक पैसा FII कमा रहे है एवं आर्थिक आपदाओं के समय देश की सरकार व देश के लोगों के पास यदि पैसा न हो तो देश भी दिवालीया हो जाता है।

भारत सरकार को SEBI की उपलब्धियों का अंकेक्षण (Performance Audit) कराना चाहिए कि जब SEBI बना तो कितने प्रतिशत लोग पूँजी बाज़ार में निवेशक थे एवं निवेशकों को सुरक्षा मिली या वे भारतीय पूँजी बाज़ार से बाहर होते जा रहे हैं तथा FII और PE Funds फंड़ भारत के पूँजी बाज़ार पर कब्जा जमा चुके है। फलस्वरुप इसका फायदा विदेशी कम्पनियों तथा SEBI अफसरों को ही मिला है किसी और को नही।

अर्थशास्त्रियों के आंकलन के अनुसार हमारे मंदिरों में लगभग 25000 टन सोना जमा है, एवं कम ले कम 50000 टन सोना भारत के लोगों के पास घरों या बैंक लाकरों में जमा है। इसका अर्थ है 1 ट्रिलियन डालर का सोना मंदिरों में तथा 2 ट्रिलियन डालर का सोना जनता के पास है। यह पूर्णरुपेण एक अनुत्पादक निवेश है, एवं इसे उत्पादक माध्यमों में लाने की आवश्यकता है।

हाल ही में सरकार ने PAHAL के नाम से LPG कनेक्शन को आधार नम्बर से जोडने की स्कीम शुरु की है। जिसमें सब्सिडी का पैसा सीधे LPG कनैक्शन धारक के बैंक खाते में पहुँचाया जाता है। बहुत बडी मात्रा में LPG कनैक्शन आधार से नहीं जोडे गए है, जिससे यह पता लगता है कि पहले बहुत बडी संख्या में LPG कनैक्शनों पर सब्सिडी का फायदा दलाल उठा रहे थे। एकदम ऐसी ही स्थिति भूमि एवं भवनों में है। बेनामी भूमि एवं भवनों के धारकों के कारण इन साधनों एवं सम्पत्तियों की कृत्रिम कमी हो गई है।

यदि सरकार सभी सम्पत्तियों को आधार नम्बर से जोड़ देती है तो बेनामी सम्पत्तियों के राज़ खुलने लगेगें तथा शायद रियल स्टेट के बाज़ार में प्रापर्टी बेचने वालों की भरमार हो जाएगी। जिसके परिणाम स्वरुप प्रापर्टी की कीमते उचित स्तर एवं आम आदमी की पहुँच के दायरे में आ जाएँगी। इससे सरकार देश में आवास की समस्या का सही आकलन एवं “2022 तक सभी के लिए घर” योजना के लिए सही नियोज़न कर पाएगी।

भारत एक आत्मज्ञान पर विश्वास करने वाला देश है, और भविष्य में भी रहगा। लोग मन्दिरों में तथा अन्य श्रद्धा स्थलों पर अपना चढावा देते रहेगें। वर्तमान समय में यह चढावा मन्दिरों की दीवारो पर सोने की प्लेट लगा कर (जिसे छतरी कहा जाता है) या अन्य रुपों में स्वर्ण दान करके होता है। इस विश्वास की डोर को तोडने की आवश्यकता नही है, आवश्यकता है कि मन्दिर ट्रस्टों के आगे नतमस्तक हो कर, उनसे यह आग्रह किया जाए कि वे आगे आएँ और शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, प्रशिक्षण, अक्षय पात्र सरीखी भोजन की योजनाओं पर कुछ कार्यक्रम आरम्भ करें। ऐसे संस्थानों को जमीन सरकार द्वारा उपलब्ध कराई जाए। इससे सरकार की संस्थान खडे करने की लागत में कमी आएगी। सभी मन्दिरों और ट्रस्टों के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विकसित की जाए। भारत के लगभग सभी 700 जिलों मे 300 से 500 बिस्तर के अस्पताल है। मरीज़ों की भारी भीड के कारण इनमें 1000 मरीज तक दाखिल रहतें है, दूसरी ओर एक प्राईवेट मैडिकल कालेज़ की लागत 300 करोड़ है जिसमें से लगभग 275 करोड़ अस्पताल की लागत होती है, एवं अधिकतर जिलों के ये अधिकांश अस्पताल खाली रहते हैं। ऐसे भी उदाहरण है कि मेडिकल काउन्सिल आफ इंडिया (MCI) की शर्तों को पूरा करने के लिए इंस्पैक्शन के समय उन्हे मरीज़ किराए पर लाने पड़ते है। सरकार को ये 700 जिला अस्पताल नए प्रस्तावित मैडिकल कालेज से PPP माड़ल पर जोडना चाहिए। प्राईवेट मैडिकल कालेज़ की 25 एकड जगह की आवश्यकता सिमट कर 10 एकड़ रह जाएगी और यह जमीन उन्हें जिला अस्पताल के 10 कि.मी. के अन्दर उपलब्ध कराई जाए। इन मैडिकल कालेज़ों में सभी पाठ्यक्रम जैसे दंत चिकित्सा, नर्सिंग, पैरामैडिक्स, इत्यादि भी शामिल हों। आंकलन के अनुसार देश को प्रतिवर्ष 2 लाख नए डाक्टर तथा 10 लाख नई नर्सें प्राप्त हो जाऐगें। अखिल भारतीय आयुर्वेदिक संस्थान (AIIMS) और स्टेट मेडिकल कालेज को केवल पोस्ट ग्रेजुएट तथा सुपर स्पेशियलिटी संस्थानों के तौर पर विकसित किया जाए। इससे स्वास्थ्य क्षेत्र के विशेषज्ञों की उपलब्धता तेजी से बढेगी और भारत एक हेल्थ टूरिज्म केन्द्र के रुप में जाना जाएगा।

इसी तरह इंजीनियरिंग कालेजों के साथ भी विकास किया जा सकता है। आई0 आई0 टी0 और एन0 आई0 टी0 को पारम्परिक इंजीनियरिंग पढ़ाने की कोई आवश्यकता नही, इनका ध्यान रोबोटिक्स एवं नैनो टेक्नोलाजी, भविष्य की युद्ध प्रणालियां, डिजिटल टेक्नोलोजी के द्वारा इंटरनेट आफ थिंग्स (वस्तुएँ) पर होना चाहिए। इन विभिन्न वस्तुओं पर प्रकाश डालने का उद्देश्य यही है कि हमारे मन्दिर और उनके ट्रस्ट सामने आएँ और अपने खज़ाने का प्रयोग इन संस्थानों के विकसित करने में करें, और सरकार के अपना ध्यान भविष्य की वस्तुओं पर रखना चाहिए।

इन मन्दिर ट्रस्टों को बोर्ड पर लाने के लिए सरकार को व्यवहारिक एवं मनाने की नीति पर चलना होगा, न की आधिकारिक एवं आदेशात्मक नीति पर। उसी प्रकार प्राइवेट इक्विटी में, एफ0 आई0 आई0 के स्थान पर सामान्य लोंगों को भागीदारी बढ़ाने के लिए प्रेरित करना होगा। जिससे एक ओर क्षेत्रिय निवेशकों और दूसरी ओर मेक इन इंड़िया मजबूत हों, अन्यथा हमारे मन्दिरों और आम आदमी द्वारा सोने का अति संग्रहण महमूद गज़नवी जैसे लोगों (ISIS,नक्सलवादी) को खुला निमन्त्रण है। जैसा कि लोग कहते हैं, ”भारत एक अमीर देश है, परन्तु यहाँ गरीब बसते हैं,” यह बात हमारी गरीब मानसिकता एवं अति संकीर्ण सोच के कारण सिद्ध हो जाएगी।

About the author

admin