नवग्रह परिचय – Introduction of Navagraha

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सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि राहु एवं केतु ग्रहों को नवग्रह कहते हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार रवि और चंद्रमा को नक्षत्रों का स्वामी, मंगल को पृथ्वी पुत्र, बुद्ध को चंद्रका का पुत्र, ब्रहस्पति को देवगुरु, शुक्र को दैत्यगुरु, शनि को सूर्य पुत्र एवं राहु-केतु को पृथ्वी का छाया पुत्र माना जाता है।

आकाश में जो असंख्य टिमटिमाते हुए तारे दिखाई देते हैं, वह किसी वस्तु से जुड़े हुए नहीं है। आकाश केवल एक खुला हुआ स्थान है जो दिन में सूर्य के प्रकाश में नीला और रात में काला दिखाई देता है यह ताराओं के विशाल समूह आकाश गंगाएं कहलाते हैं। ब्रह्मांड में पाई जाने वाली इन करोड़ों आकाश गंगाओं में से एक आकाश गंगा में हमारा सौरमंडल स्थित है। सौरमंडल में स्वयं सूर्य और उनके उपग्रह आदि होते हैं। सूर्य का यह परिवार ही सौरमंडल कहलाता है। वह सभी ग्रह सूर्य से आकर्षित होकर उसकी परिक्रमा करते हैं और उपग्रह अपने ग्रह के साथ सूर्य की परिक्रमा करते हैं। सौर मंडल के मध्य स्थित है और बाकी ग्रह इसके चारों ओर स्थित हैं। सूर्य से क्रमशः बुद्ध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, बृहस्पति, शनि, राहु-केतु स्थित है। चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह है। ग्रह मंडल की गति से यह स्पष्ट है कि पृथ्वी ब्रह्मांड के मध्य अन्य सामान्य ग्रहों की तरह स्थित है परंतु जीवन धारण कारक वायुमंडल, पानी, तापमान, आदि किसी अन्य ग्रहों से भिन्न करता है। विस्तारित ग्रह मंडल के बावजूद कोई भी ग्रह अपने आप में अकेले परिभ्रमण नहीं करता है परंतु सभी ग्रह एक दूसरे के आकर्षण-विकर्षण शक्ति के कारण परिभ्रमण करते रहते हैं। हर एक ही अपनी आकर्षण शक्ति है और जिसका जितना बड़ा पिंड है, उतनी ही उसकी आकर्षण शक्ति है। वह जितना दूसरे ग्रह के संपर्क में आता है उतना ही उससे आकर्षित करता है। इसलिए प्रत्येक ग्रह एक दूसरे को आकर्षित कर रहा है और एक दूसरे के गति से प्रभावित रहता है। इस कारण ग्रहों के आपसी संबंधों का बहुत महत्व है। जितनी कम दूरी होगी और पिंड बड़ा होगा उतना ही आकर्षण उसके प्रति ज्यादा होगा। चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह होने के कारण पृथ्वी के सबसे नजदीक है और इसका बहुत महत्व है। सबसे बड़ा ग्रह शनि है और उसके बाद बृहस्पति का स्थान है। इस कारण पृथ्वी संबंधी (सांसारिक) घटनाओं पर बहुत प्रभाव पड़ता है। सारे ग्रह एक दूसरे का प्रभावित करते हैं, और पृथ्वी के वातावरण और जन-जीवन पर उनका सीधा असर पड़ता है।

ग्रहों की गति एक निश्चित पथ पर निश्चित समय के द्वारा बंधी हुई है। आकाश में जिस मार्ग से सभी ग्रह सूर्य के इर्द गिर्द चक्कर लगाते हैं उसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। यह क्रांतिवृत्त पृथ्वी से सूर्य परिक्रमा मार्ग का  नाक्षत्रिक वृत्त है। इस विशिष्ट माता आकाशीय विस्तार राशि है, जिसकी 2 भाग है और प्रत्येक भाग 30 अंशों का होता है। इन 12 राशियों का आकार आकाश के तारों के आकार पृथ्वी पर रहने वाले जीव जंतुओं के आकार पर होने के कारण ही उसका वैसा नाम पड़ा है। इस प्रकार से मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन ये 12 राशियाँ बनी। मनुष्य के भाग्य का संबंध ग्रहों की गति पर अवलंबित है और ग्रहों की गति क्रांतिवृत्त के आसपास के नक्षत्र मंडल में होती है। ताराओं का समूह नक्षत्र कहलाता है। विभिन्न रुपों और आकारों में जो तारा-पुँज दिखाई देते हैं, उन्हें नक्षत्र कहा जाता है। संपूर्ण आकाश को 27 भागों में विभाजित कर प्रत्येक  बाग का अधिपति एक नक्षत्र मान लिया गया है।

इन नक्षत्रों और ग्रहों का सीधा प्रभाव मानव पर पड़ता है और इसके प्रभाव के अनुकूल ही मानव जीवन संचालित होता है। यही नहीं इन ग्रहों का प्रभाव मानव पर व्यक्तिगत रूप से और सार्वजनिक रूप से भी पड़ता है। इसलिए जीवन का संपूर्ण सुख-दुख, लाभ-हानि और जय-पराजय आदि विषय इन नवग्रहों पर आधारित होते हैं। यह ग्रह 27 नक्षत्रों और 12 राशियों पर सतत भ्रमण करते रहते हैं जिससे ऋतुएं, वर्ष, मांस और दिन रात बनते हैं इस प्रकार अपनी गति के अनुरूप यह ग्रह मन्द अथवा तीव्र चाल से एक-एक राशि को पार करते रहते हैं। 12 राशियों हेतु नवग्रहों को इनका स्वामी चुना गया है जैसे मेष-वृश्चिक का स्वामी मंगल, बुध-तुला का स्वामी शुक्र, कन्या-मिथुन का स्वामी बुध, कर्क का चंद्रमा, सिंह का सूर्य, धनु-मीन का गुरु और मकर-कुंभ का स्वामी शनि को माना गया है। नाम के अनुसार इन राशियों पर स्थित ग्रहों की चाल देखकर बताया जाता है कि अमुक व्यक्ति के अमुक समय अच्छा है या नहीं है। जब जन्म कुंडली अथवा वर्ष/कुंडली में कोई ग्रह खराब बैठा हुआ अपना अच्छा असर नहीं करता तब कहा जाता है कि अमुक ग्रह खराब है इसके लिए दान, पुण्य, अनुष्ठान कराओ समय अच्छा नहीं है तथा आने वाला समय और भी बुरा है। और पूरे के पश्चात तो अच्छा ही होना चाहिए परंतु प्रत्येक अच्छा या बुरा समय बहुत कुछ अपने पूर्णगामी समय पर निर्भर रहता है कि उसमें जातक को कितनी स्थाई हानि अथवा स्थायी लाभ पहुंचता है। इसलिए ग्रह शांति अवश्य कराने चाहिए।

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