मोदी जी का U-Turn: कालाबाज़ारियो को एक ओर मौका या सांसदो का दबाव ??

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28/11/2016 को भारत के वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली जी ने लोक सभा में आयकर संशोधन बिल, 2016 पेश किया। 10/11/2016 से विमुद्रीकरण के निर्णय के कारण भारतवासियो को प्रताड़ित करने के बाद यह बिल लाया गया है।

इस बिल की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार है-

  • स्वेच्छा से घोषित आय पर 30% से आयकर + 10% जुर्माना + 33% अधिभार (Surcharge) e. कुल मिलाकर 50% से आयकर।
  • यदि विमुद्रीकरण की योजना की अन्तिम तारीख 30/12/2016 के बाद कोई अघोषित आय पाई जाती है तो उस पर कर 75% की दर से आयकर + 10% से दण्ड (Penalty) e. कुल मिलाकर 85% से आयकर।
  • अघोषित आय का एकत्र किया गया अघिभार (Surcharge) “प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना” में लगाया जाएगा और इसे सिचाई, ग्रह विकास, प्रथमिक शिक्षा, स्वास्थय, शौचालय निर्माण आदि जैसे कार्यो के लिए उपयोग किया जाएगा।
  • अघोषित आय का 25% अगले चार वर्षो तक ब्याज रहित deposit के रुप में हस्तानतंरित किया जाएगा

अब प्रश्न उठता है कि सरकार को एक दूसरी VDIS लाने के पीछे कौन-कौन से कारण हो सकते है-

  • हो सकता है कि सरकार को ऐसा लगने लगा कि निकट भविष्य मे देश की जनता सरकार के इस कदम को सराहने के बदले, उसके खिलाफ हो जाएगी।
  • या सत्ताधारी दल के अपने संसद सदस्यो का कोई दबाव हो।
  • या विपक्ष के किसी दबाव के कारण।
  • या यह भी हो सकता है कि यह कदम सरकार की स्वंय की विमुद्रीकरण की नीति का ठीक प्रकार से या प्रभावी रुप से क्रियावन न हो पाना हो, (क्योकि सरकार ने स्वयं कहा कि इन 20-21 दिनों मे लगभग 8 लाख करोड़ रुपये बैकों में जमा हो चुका है) जैसे ही नए नोट बैंक में आते है वे समाप्त हो जाते है। अर्थात बैंकों मे जमा राशि अधिक समय तक नही टिक पाने का डर कही ना कही सरकार को सता रहा है और यदि अधिकांश धन नकदी के रुप में बैंकों से बाहर आ जाता है तो काले धन की समस्या ज्यों की त्यों रह जाएगी।
  • या फिर सरकार काले धन रखने वालों के प्रति नरम रुख अपनाते हुए, उन्हे एक और मौका देना चाहती है।

कारण चाहे कुछ भी रहे परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार अपनी विमुद्रीकरण नीति द्वारा बड़े पैमाने पर सुधार के लक्ष्य में बुरी तरह असफल रही है और क्या यह दूसरी VDIS लाने के लिए ही 95% जनता को असुविधा भोगनी पड़ रही है ?

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