सोमवती अमावस्या का महत्व

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अमावस्या पूर्णमासी जैसे पुण्य दिवसों का भारतवर्ष में बहुत महत्व है । अमावस्या पितरों के लिए व पूर्णमासी देवताओं के लिए बहुत महत्वपूर्ण मानी गई हैं । मनुष्य मात्रा के लिए पितर व देव दोनों ही पूजनिय व वन्दनीय हैं । सोमवार के दिन अमावस्या होने पर सोमवती अमावस्या होती है। जिसका महत्व कई गुणा बढ़ जाता है ।

पंडित गोविन्द कृष्ण वत्स का कहना है कि चन्द्रमा मन का स्वामी है । चन्द्रमा से मनोबल को बढ़ाने व पितरों के आशिर्वाद द्वारा सभी प्रकार की बाधाओं से छुटकारा पाने के लिए जातक को अपने पितरों के निमित्त प्रत्येक अमावस्या को श्रद्धा व्यक्त करनी चाहिये श्रद्धा व्यक्त करना मनुष्य मात्रा में एक श्रेष्ठ गुण है । अमावस्या को विशेष रूप से श्रद्धा व्यक्त करने का कारण यह है कि सूर्य की सहòों किरणों में जो प्रमुख हैं, उसका नाम “अमा“ है । “अमा“ नाम की प्रधान किरणों के तेज से ही सूर्यदेव तीनों लोकों को प्रकाशित करते हैं । इसी “अमा“ में तिथि विशेष को चन्द्रदेव निवास करते हैं इसलिए उसका नाम “अमावस्या“ है। यही कारण है कि अमावस्या प्रत्येक धर्म कार्य के लिए अक्षय फल देने वाली बताई गई है । श्राद्ध कर्म में तो इसका विशेष महत्व है।

हमारे पूर्वजन्मों के पाप स्वरूप इस जीवन श्रृंखला में बहुत से इच्छित पदार्थ तथा सुख प्राप्त नहीं हो पाते हैं । इसके लिए शास्त्रों में वर्णित तथा संत पुरुषों द्वारा समय समय पर सुझाये गये उपाय व प्रयोग करने पर सुखद व लाभकारी परिणाम प्राप्त होते हैं । ऐसा केन्द्र का अनुभव है । जिनमें करने हेतु कुछ विशेष कार्यों का वर्णन करते हुये पंडित गोविन्द कृष्ण वत्स कहते हैं कि……..

  • तिल तथा जल की अंजलि देनी चाहिए ।
  • अमावस्या को नान्दी मुख श्राद्ध का भी बहुत महत्व है ।
  • सोमवती अमावस्या को पीपल की परिक्रमा पितरों के निमित्त करें । इसके परिणाम बहुत उत्साह वर्धक होते हैं ।
  • पितरों के निमित्त यजुर्वेद का एक मंत्रा भी बताते हैं जोकि इस प्रकार है:- (ऊँ पितृभ्य स्वधायिभ्यः स्वधा नमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः । प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः। अक्षन् पितरो ऽमीमदन्त पितरो ऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम् ।। ऊँ पितरभ्ये नमः।।) जप पितरों के निमित्त करना या करवाना चाहिये ।

सूर्य, चन्द्र जब एक राशि में आते हैं उस तिथि में सोमवार हो तभी सोमवती अमावस्या कहलाती है इसीलिये इस अमावस्या को किया गया जप, पूजन, दान आदी विशेष फलदायी होता है । दूसरा रहस्य यह है कि जातकों पर पितृ दोष या प्रकोप होता है इसीलिये वह शान्ति से बंचित रहते हैं लेकिन वह इस प्रयोग को करते ही लाभान्वित होते हैं और पितरों के तृप्त हो जाने से पितृगण कत्र्ता को धनधान्य, पुत्रा आदी से परिपूर्ण कर देते हैं ।

पंडित जी कहते हैं कि यदि कुछ न बन पड़े तो इस दिन कुछ न कुछ दान अवश्य करें ।

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